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SIR विवाद: विपक्ष का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च, जंतर-मंतर बंद और BJP का पलटवार

SIR विवाद में राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की रोक और BJP के जवाब से सियासी हलचल बढ़ी. 12 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में दो मार्च निकाले गए. एक...

SIR विवाद में राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की रोक और BJP के जवाब से सियासी हलचल बढ़ी.

12 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में दो मार्च निकाले गए. एक मार्च विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ निकाला, तो दूसरा कांग्रेस सांसद के खिलाफ यौन उत्पीड़न के आरोपों पर कार्रवाई की मांग को लेकर था. यानी इस दिन दोनों तरफ से प्रदर्शन हुए. इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट, चुनाव आयोग, दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार की भूमिका चर्चा में रही.

राहुल गांधी ने ज्ञानेश कुमार पर क्या आरोप लगाए?

12 अक्टूबर की सुबह करीब साढ़े 11 बजे नेता विपक्ष राहुल गांधी अपने सरकारी बंगले, 5 सुनहरी बाग रोड से निकले और कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन पहुंचे. यहां करीब 40 मिनट की प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने सवाल उठाया कि भारत की राजधानी दिल्ली जेल क्यों बन गई है? उन्होंने कहा कि यह लड़ाई चार मोर्चों पर है और विपक्ष सड़क के साथ-साथ विचारों के स्तर पर भी लड़ रहा है.

राहुल गांधी ने एक बार फिर कहा कि ज्ञानेश कुमार को सरकारी गवाह बन जाना चाहिए. जब एक पत्रकार ने पूछा कि क्या उनकी ज्ञानेश कुमार से कोई बात हुई है, तो राहुल ने कहा कि उन्हें मैसेज आ रहे हैं. उन्होंने यह भी दावा किया कि करीब 200 अधिकारी उनके संपर्क में हैं.

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) को लेकर भी सवाल पूछा गया कि क्या दो अलग-अलग विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. इस पर राहुल गांधी ने आंदोलन को शिवजी की बारात बताया, जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है. उन्होंने कहा कि आंदोलन का मकसद ज्ञानेश कुमार को हटाना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह की जवाबदेही तय करना है.

इसके बाद राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को मार्च निकालने का ऐलान किया. उन्होंने लोगों से कनॉट प्लेस के बाराखंभा प्वॉइंट पर जुटने और वहां से सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करने की अपील की.


CJI सूर्यकांत ने विपक्षी सांसदों से मिलने से क्यों मना किया?

विपक्ष के मार्च का मकसद समझने के लिए एक दिन पीछे जाना होगा. 11 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत को चिट्ठी लिखकर ज्ञापन सौंपने के लिए मुलाकात का वक्त मांगा था. उसी रात CJI का जवाब आ गया और उन्होंने मिलने से मना कर दिया.

CJI ने अपने जवाब में कहा कि लंबित मामलों पर चर्चा के लिए बैठक करना ‘सेपरेशन ऑफ पावर्स’, यानी शक्तियों के बंटवारे के सिद्धांत के खिलाफ होगा. यह सिद्धांत संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा है. उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पास चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों से निपटने के लिए जरूरी अधिकार नहीं हैं.

हालांकि, CJI ने आगे का रास्ता भी बताया. उन्होंने कहा कि ऐसे ही कुछ मामलों की सुनवाई 13 अक्टूबर को होनी है. विपक्षी सांसद 12 अक्टूबर को सुबह साढ़े 10 बजे से शाम साढ़े 4 बजे के बीच सुप्रीम कोर्ट में याचिका जमा कर सकते हैं.

12 अक्टूबर की सुबह जब CJI से पूछा गया कि चिट्ठी में क्या लिखा था, तो उन्होंने कहा कि यह विपक्षी सांसदों से पूछिए. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सबके लिए खुले हैं.

राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि विपक्ष CJI और सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करता है और याचिका दायर करने का सुझाव आगे का रास्ता है. CPI नेता डी राजा ने बताया कि सांसद मार्च करेंगे, जबकि INDIA गठबंधन के 10 नेता याचिका पर दस्तखत करके उसे सुप्रीम कोर्ट में जमा करेंगे. उनकी मांगों में SIR पर रोक और मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा शामिल है.


विपक्षी सांसदों का सुप्रीम कोर्ट तक मार्च 

इसके बाद विपक्षी सांसद कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में इकट्ठा हुए. वहां पहले नारेबाजी हुई. समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव, शिवसेना (उद्धव गुट) के संजय राउत, JMM की महुआ माझी और TMC की महुआ मोइत्रा समेत कई जाने-माने नेता नजर आए.

करीब ढाई बजे बसें रवाना हुईं. इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, तेजस्वी यादव और मनोज झा समेत कई नेता मौजूद थे. बस में AISA नेता नेहा बोरा और एक्टिविस्ट योगेंद्र यादव भी थे.

तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी, डिप्टी सीएम भट्टी विक्रमार्क, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष, सांसद और विधायक भी प्रदर्शन में पहुंचे. रिपोर्ट्स के मुताबिक, कांग्रेस ने अपने चारों मुख्यमंत्रियों, सभी राज्यों के नेता विपक्ष और प्रदेश अध्यक्षों को दिल्ली बुलाया था. कांग्रेस मुख्यालय के बाहर कार्यकर्ताओं के ठहरने के लिए बड़ा टेंट लगाया गया. वहीं, लखनऊ से समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी दिल्ली के लिए रवाना हुए.

करीब 3 बजे बसें बाराखंभा रोड पहुंचीं. असद रहमान की रिपोर्ट के मुताबिक, बसों के पहुंचते ही वहां भीड़ बढ़ने लगी और नेता सुप्रीम कोर्ट की तरफ बढ़ने लगे. विपक्षी नेताओं ने इस दौरान अपने-अपने बयान दिए और मार्च के मकसद को सामने रखा.


विपक्ष का पहला प्रदर्शन नहीं, पहले भी कई बार हुआ मार्च 

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR के खिलाफ यह विपक्ष का पहला प्रदर्शन नहीं था. 6, 7, 8 और 9 अक्टूबर को भी विपक्षी सांसद प्रदर्शन कर चुके थे. 6 अक्टूबर को चुनाव आयोग तक मार्च के दौरान राहुल गांधी बैरिकेड पर चढ़ गए थे. इसके बाद वह आकाशवाणी भवन में धरने पर बैठ गए थे. 7 और 8 अक्टूबर को लंच डिप्लोमैसी के जरिए प्रदर्शन किया गया. विपक्षी नेताओं ने कनॉट प्लेस में लंच करने के बाद जंतर-मंतर और राजघाट की ओर कूच किया था.


दिल्ली के छह मेट्रो स्टेशन बंद, 30 हजार से ज्यादा जवान तैनात 

अब उस शहर का हाल देखिए, जिसकी सड़कों पर यह सब हो रहा था. 12 अक्टूबर की सुबह दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) ने X पर पोस्ट कर सेंट्रल दिल्ली के छह मेट्रो स्टेशन बंद करने की जानकारी दी. इसकी वजह सुरक्षा बताई गई.

इन स्टेशनों पर इंटरचेंज यानी मेट्रो की लाइन बदलने की सुविधा चालू रही. इसका मतलब था कि यात्री ट्रेन बदल सकते थे, लेकिन स्टेशन से बाहर नहीं निकल सकते थे. DMRC ने यह भी कहा कि सुरक्षा एजेंसियां हालात की समीक्षा करेंगी और आगे की जानकारी दी जाएगी.

यह इसलिए अहम है क्योंकि एक दिन पहले, 11 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि दिल्ली मेट्रो सामान्य रूप से चले और इंटरनेट बाधित न हो. हालांकि, अदालत ने यह भी कहा था कि अगर संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा हो, तो पाबंदियां लगाई जा सकती हैं.

अब सवाल है कि 12 अक्टूबर को लगाई गई पाबंदियां इस अपवाद के दायरे में आती हैं या नहीं. यह मुद्दा 13 अक्टूबर को अदालत में उठ सकता है, क्योंकि उसी दिन सार्वजनिक सेवाओं पर पाबंदियों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई होनी है.

दिल्ली में 30 हजार से ज्यादा पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती जारी रही. मंडी हाउस और सुप्रीम कोर्ट के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी गई. दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी ने सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि वह चाहते हैं कि 20 से 30 हजार पुलिसकर्मी सड़क पर हों, ताकि देश देख सके कि सरकार ज्ञानेश कुमार को किस हद तक बचा रही है.


सुप्रीम कोर्ट में वकीलों के साथ बदसलूकी का मुद्दा उठा 

अब चलते हैं सुप्रीम कोर्ट, जहां तक विपक्ष ने मार्च निकाला था. सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष प्रदीप राय और वरिष्ठ वकील आत्माराम नाडकर्णी ने 10 अक्टूबर को विरोध प्रदर्शन के दौरान वकीलों के साथ हुई बदसलूकी का मुद्दा उठाया.

CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने मामले की सुनवाई की. CJI ने कहा कि इस मामले पर 13 अक्टूबर को विस्तार से सुनवाई होगी. उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक गतिविधियां होनी चाहिए और उनसे कोई परेशानी नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का कामकाज प्रभावित नहीं होना चाहिए.

CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट किसी राजनीतिक दल के साथ नहीं है और अदालत को इस तरह के मामलों में नहीं घसीटा जाना चाहिए. वकीलों, कोर्ट स्टाफ और मुकदमा लड़ने वालों की आवाजाही में कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए.

इसके बाद वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने नई याचिका का जिक्र किया. उन्होंने आरोप लगाया कि वकीलों को सड़कों पर घसीटा गया. वरिष्ठ वकील शादान फरासत को घसीटे जाने के दृश्य लोगों ने देखे. दिनेश द्विवेदी और उत्तरा बब्बर को बसों में हिरासत में रखा गया.

शंकरनारायणन ने कहा कि अदालत वकीलों से संयम रखने की बात करती है और उम्मीद है कि एक दिन पुलिस से भी यही बात कही जाएगी. उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग लाठियां लेकर घूम रहे हैं, बच्चों के सिर पर वार कर रहे हैं और बाद में वीडियो डालकर इस पर गर्व जता रहे हैं, जबकि पुलिस कुछ नहीं कर रही.

CJI ने इस पर फिलहाल कुछ भी कहने से इनकार कर दिया. उन्होंने इतना जरूर कहा कि बार के हर सदस्य को शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल होने का अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन तय जगहों पर होना चाहिए. यहां तय जगहों वाली बात अहम है, क्योंकि 12 अक्टूबर को ही दिल्ली में प्रदर्शन की तय जगहों की सूची में बदलाव किया गया था. 

SCBA ने अपनी याचिका में हिरासत के मामलों पर पुलिस से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है. इसके अलावा, शामिल पुलिस अधिकारियों की पहचान करने और CCTV फुटेज, हिरासत के रिकॉर्ड तथा बॉडी कैमरे की फुटेज सुरक्षित रखने की मांग की गई है. इन सभी याचिकाओं पर 13 अक्टूबर को सुनवाई होनी है.


फॉर्म 6 पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? 

सुप्रीम कोर्ट से एक और अहम खबर आई. यह वोटर लिस्ट में नया नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 से जुड़ी है. 12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 27 मई को बिहार SIR मामले में दिए गए फैसले में फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को न तो मंजूरी दी गई थी और न ही खारिज किया गया था. इसकी वजह यह है कि उस फैसले में सिर्फ बिहार में पायलट SIR की वैधता पर विचार किया गया था. फॉर्म 6 में बदलाव उसके बाद जुलाई में किए गए थे. ECINet पोर्टल पर नए आवेदकों के लिए एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी. आवेदकों को बताना था कि पिछली SIR की वोटर लिस्ट में उनका, उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम था या नहीं. इस सवाल का जवाब दिए बिना फॉर्म जमा नहीं किया जा सकता था.

CJI सूर्यकांत की बेंच में शामिल जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि जब बिहार SIR मामले की सुनवाई हुई थी, तब नया फॉर्म 6 आया ही नहीं था. अदालत ने न तो इसे मंजूरी दी थी और न ही खारिज किया था. उन्होंने कहा कि अब अदालत इस मामले की जांच करेगी. यह टिप्पणी प्रिया मिश्रा की याचिका पर आई, जिसमें कई राज्यों में SIR के दौरान फॉर्म 6 में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है. याचिकाकर्ता के वकील ने 5 अक्टूबर की सुनवाई का जिक्र किया, जब CJI ने कहा था कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव अदालत ने नहीं किया है. वकील की शिकायत थी कि इसके बावजूद चुनाव आयोग बदलावों को यह कहकर सही ठहरा रहा है कि अदालत ने उन्हें मंजूरी दी थी.

यह मामला इसलिए अहम है क्योंकि फॉर्म 6 कोई साधारण फॉर्म नहीं है. यह 1960 के रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स की अनुसूची में शामिल एक कानूनी दस्तावेज है. सवाल यह है कि इसमें बदलाव नियमों में बदलाव करके किया गया या सिर्फ एक प्रशासनिक फैसले के जरिए. 27 मई के फैसले में अदालत ने फॉर्म 6 को दस्तावेजों की जांच के लिए एक ढांचे के तौर पर जरूर माना था, लेकिन नए फॉर्म की वैधता की जांच अब होगी. इंडियन एक्सप्रेस की इंवेस्टिगेशन रिपोर्ट के मुताबिक, बाकी दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर संधू और विवेक जोशी ने फॉर्म में नई घोषणा जोड़ने को गैर-कानूनी बताया था. कानून के मुताबिक, इसमें बदलाव करने का अधिकार सरकार के पास है. 

दिल्ली हाईकोर्ट में भी प्रदर्शन से जुड़ी याचिकाएं  

दिल्ली हाईकोर्ट में भी हलचल रही. जंतर-मंतर बंद किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने तुरंत सुनवाई करने से इनकार कर दिया और मामले को 13 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध कर दिया. एक्टिंग चीफ जस्टिस नितिन सांबरे ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इससे जुड़े मामले सुन रहा है.

10 अक्टूबर की हिंसा की SIT जांच की मांग वाली NSUI की याचिका पर भी 13 अक्टूबर को सुनवाई होनी है. इस बीच, दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य 12 अक्टूबर को काली रिबन बांधकर अदालत पहुंचे. हाईकोर्ट के लॉन में वकीलों ने संविधान की प्रस्तावना भी पढ़ी.


CJP ने दिल्ली पुलिस को दिया 24 घंटे का अल्टीमेटम 

अब बात कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की. इसके सह-संयोजक आशुतोष रांका और सौरव दास 12 अक्टूबर को संसद मार्ग थाने पहुंचे. उनका मकसद जंतर-मंतर पर ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के लिए तारीख और वक्त मांगना था.

करीब आधे घंटे की बैठक के बाद CJP ने पुलिस को 24 घंटे का अल्टीमेटम दे दिया. रांका ने कहा कि अगर 24 घंटे में जवाब नहीं आया, तो वे खुद तय करेंगे कि जंतर-मंतर कब लौटना है और प्रदर्शन की नई तारीख का ऐलान करेंगे. 


जंतर-मंतर अब प्रदर्शन की तय जगह नहीं

दोपहर तक खबर आ गई कि दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के 11 अक्टूबर के स्टैंडिंग ऑर्डर के मुताबिक, जंतर-मंतर अब प्रदर्शन की तय जगह नहीं है. उसकी जगह तीन नए मैदानों को चुना गया है—रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली का CBD मैदान. आदेश में कहा गया है कि गृह मंत्रालय ने प्रदर्शन के लिए दूसरी जगहों की तलाश करने के लिए एक कमेटी बनाई थी. उसी की सिफारिशों के आधार पर जंतर-मंतर को तय प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाया गया है.

यह आदेश 28 अप्रैल 2022 के पुराने आदेश में कुछ बदलाव करता है. नई जगहों पर प्रदर्शन की इजाजत लेने की प्रक्रिया के लिए अलग से नियम जारी किए जाएंगे. यानी जगहें तय कर दी गई हैं, लेकिन वहां प्रदर्शन की इजाजत कैसे मिलेगी, यह अभी साफ नहीं है. CJP ने इस फैसले का विरोध किया. सौरव दास ने कहा कि यह मंजूर नहीं है और सवाल उठाया कि नरेंद्र मोदी जंतर-मंतर से डरते क्यों हैं. उन्होंने कहा कि जंतर-मंतर भारत के लोगों का है और अब पूरा देश ही जंतर-मंतर है.


जंतर-मंतर पर पहले भी लग चुकी है रोक 

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन रोकने की कोशिश पहले भी हो चुकी है. अक्टूबर 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने यहां प्रदर्शन रोकने और प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने को कहा था. इसके पीछे तीन वजहें बताई गई थीं. पहली, कोई सरकारी आदेश जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल घोषित नहीं करता था. दूसरी, दिल्ली मास्टर प्लान में यह रिहायशी इलाका था. तीसरी, प्रदर्शनों से शोर का प्रदूषण होता था.

लेकिन जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब इलाके में प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाने के खिलाफ फैसला दिया. अदालत ने कहा कि प्रदर्शन किए जा सकते हैं, लेकिन उनका तरीका और भीड़ की संख्या तय नियमों के दायरे में होनी चाहिए.

अब नई जगहों की दूरी पर नजर डालिए. मध्य दिल्ली में मौजूद रामलीला मैदान जंतर-मंतर से करीब 3 किलोमीटर दूर है. उत्तर-पश्चिम दिल्ली का बुराड़ी मैदान करीब 16 किलोमीटर दूर है, जबकि पूर्वी दिल्ली का CBD मैदान 26 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है. रामलीला मैदान का अपना राजनीतिक इतिहास भी है. 1975 में जयप्रकाश नारायण की रैली यहीं हुई थी. 2011 में अन्ना हजारे का आंदोलन भी यहीं पहुंचा था.


जंतर-मंतर को हटाने की वजह क्या है?  

दिल्ली पुलिस के आदेश में जंतर-मंतर को हटाने की कोई खास वजह नहीं बताई गई है. लेकिन माना जा रहा है कि इसकी एक बड़ी वजह संसद से इसकी कम दूरी है. जंतर-मंतर संसद से सिर्फ डेढ़ किलोमीटर दूर है. जून-जुलाई में हुए धरने के दौरान प्रदर्शनकारी संसद के काफी करीब पहुंच गए थे. यही बात इस फैसले को सिर्फ प्रशासनिक मामला नहीं रहने देती. 

जंतर-मंतर का मकसद ही यह था कि विरोध की आवाज सत्ता तक पहुंचे. संसद, नॉर्थ ब्लॉक और साउथ ब्लॉक जैसे अहम सरकारी दफ्तर इसके करीब हैं. बोट क्लब से जंतर-मंतर तक प्रदर्शन स्थलों को सत्ता के केंद्र से धीरे-धीरे दूर किया जाता रहा है. अब तीन विकल्पों में से एक जगह 26 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है. 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर के विकल्प के तौर पर ऐसी बड़ी जगह तलाशने की बात कही थी, जहां पानी, टॉयलेट और मेडिकल जैसी सुविधाएं हों. विकल्प तो मिल गया, लेकिन इसके साथ ही जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से ही हटा दिया गया. 


BJP ने विपक्ष के मार्च पर क्या कहा?  

विपक्ष और प्रदर्शन से जुड़ी गतिविधियों के बाद अब बात सत्ता पक्ष की. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मुंबई में विपक्ष की CJI से मिलने की मांग पर सवाल उठाया. उन्होंने पूछा कि संविधान में कहां लिखा है कि चीफ जस्टिस को किसी विरोध मार्च से मिलना ही होगा? 

केंद्रीय मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी राहुल गांधी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि यह शिवजी की बारात नहीं, बल्कि अराजकतावादियों की भीड़ है.


कांग्रेस सांसद पर यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर BJP का प्रदर्शन 

इसी बीच, BJP की महिला मोर्चा ने कांग्रेस मुख्यालय के पास प्रदर्शन किया. प्रदर्शनकारियों ने JNU की 11 छात्राओं को न्याय दिलाने की मांग की. उनके निशाने पर इनर मणिपुर सीट से कांग्रेस सांसद अंगोमचा बिमोल अकोइजम थे, जो पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में प्रोफेसर थे. 11 छात्राओं ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं.

9 अक्टूबर को JNU ने अपनी अंदरूनी कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें बर्खास्त कर दिया था. 11 अक्टूबर को JNU के चीफ सिक्योरिटी ऑफिसर की शिकायत पर वसंत कुंज नॉर्थ थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 75 और 79 के तहत FIR दर्ज की गई. पुलिस मामले की जांच कर रही है. BJP सांसद बांसुरी स्वराज ने राहुल गांधी से सवाल किया कि क्या ‘स्मैश द पैट्रियार्की’ सिर्फ एक नारा है? 

वहीं, अकोइजम ने आरोपों से इनकार किया है. उन्होंने X पर JNU की वाइस चांसलर शांतिश्री डी. पंडित पर झूठ बोलने का आरोप लगाया. अकोइजम ने लिखा कि उनके गवाह 14 अगस्त को बयान दे चुके थे, उन्होंने 31 मई को लिखित जवाब दिया था और 16 जुलाई को कमेटी के सामने पेश भी हुए थे. इसके बावजूद उन पर सहयोग न करने का आरोप लगाया जा रहा है. उन्होंने पूरी कार्रवाई को ‘विच हंट’ यानी जानबूझकर निशाना बनाने की कार्रवाई बताया और अपनी बर्खास्तगी को चुनौती भी दी है.


केरल विधानसभा में ज्ञानेश कुमार को हटाने का प्रस्ताव पास

राजनीतिक टकराव का असर केरल में भी देखने को मिला. वहां की विधानसभा ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पास किया. ऐसा करने वाली यह देश की पहली विधानसभा है. यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री वीडी सतीशन ने पेश किया. 140 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस गठबंधन के 102 विधायक हैं. 35 विधायकों वाले लेफ्ट ने भी इस प्रस्ताव का समर्थन किया. प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुआ.

प्रस्ताव में मांग की गई कि SIR में सामने आई गड़बड़ियों को दूर किया जाए और गलत तरीके से वोटर लिस्ट से हटाए गए सभी योग्य मतदाताओं का वोट देने का अधिकार बहाल किया जाए. इसके साथ ही मांग की गई कि मुख्य चुनाव आयुक्त को चुनने वाली कमेटी में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और चीफ जस्टिस शामिल हों.

केरल BJP अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने इस प्रस्ताव को गैर-कानूनी बताया. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि जो CPM और कांग्रेस एक-दूसरे के विरोधी होने का दावा करते हैं, उनके 137 विधायक आज एक साथ खड़े नजर आए. उन्होंने कहा कि मामला अदालत में चल रहा है और विधानसभा ने इसे उठाकर स्थापित नियमों का उल्लंघन किया है.


SIR में हटाए गए नामों पर चुनाव आयोगों का नया अपडेट 

दिन के आखिर में अलग-अलग राज्यों के चुनाव आयोगों ने भी जरूरी अपडेट दिए. SIR के दौरान जिन लोगों के नाम ‘लॉजिक डिस्क्रेपेंसी’ और ‘अनमैपिंग’ के आधार पर हटाए गए थे, उनके मामलों को नए सिरे से देखने और हल निकालने की बात कही गई. दिल्ली, झारखंड, मिजोरम, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, बिहार, पुडुचेरी, उत्तराखंड और गुजरात समेत कई राज्यों के चुनाव आयोगों ने इस तरह की जानकारी साझा की.


12 अक्टूबर का पूरा घटनाक्रम के बाद 13 अक्टूबर पर नजर 

तो यह था 12 अक्टूबर का पूरा हाल. दो मार्च निकले और दोनों तरफ से एक ही शब्द सुनाई दिया ‘न्याय’. इन सबके बीच दिल्ली के छह मेट्रो स्टेशन बंद रहे, सड़कों पर 30 हजार से ज्यादा पुलिस और अर्धसैनिक बल तैनात रहे और शहर का 33 साल पुराना प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर तय जगहों की सूची से हटा दिया गया.

अब नजरें 13 अक्टूबर पर हैं. इस दिन अदालतों में कई अहम मामलों की सुनवाई होनी है. CJP का अल्टीमेटम भी तब तक पूरा हो जाएगा. विपक्ष भी नए सिरे से आगे की रणनीति के साथ सामने आ सकता है. बैरिकेड भीड़ को रोक सकते हैं, लेकिन सवालों को दबाने की हर कोशिश उन्हें और ऊंचा कर देती है. 

#SIR

MD JILLANI MANSURI

मो. जिलानी मंसूरी हिंदुस्तान तक न्यूज़ के चीफ एडिटर हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में लंबे समय से सक्रिय हैं। वे निष्पक्ष, तथ्यपरक और जनसरोकार से जुड़ी खबरों को प्राथमिकता देते हुए पाठकों तक विश्वसनीय जानकारी पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

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